उठ प्यारे चल जाग उठ
क्यों बिचारण में है तू अमुख
जिसको तु समझें है सुख
वो तो है केवल मीठा दुःख
बन मधुमख्खी सा कर्म प्रमुख
क्यों स्वप्न में सदैब खोया रहेता
जीवनके मीठे झूठको सहेता
बन शून्य क्यों तु शून्य में डूबा भिक्छुक
तु ही तो है जो चीरे भूख
बन हथौड़ा तू शिला पर गिर
बन मूरत वह भी जाये खिल
तुझ में है वो अबिरल धरा
जिसके आगे गिरा जग सारा
बस सिख तु थोड़ा हाँ झुक
क्यों अधियारेको करे आलंगन
क्यों नदिखे है तुझको जन क्रंदन
कुर्शी क्यों इतनी प्यारी है
सुखकी पट्टी लगा तु मुर्ख
क्यों धरातलको भूले प्रमुख
This is one of my few poems which i have written in hindi language .
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